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Saturday, 2 February 2019

बेगैरत



हमारे कुछ राज़...
अपने सीने में दफ़न कर लो,
की शायद फ़िर नींद ना आये तुम्हें,
ये जो दर्द देकर...
बेगैरत से फिरते हो तुम,
कि हमारे देर तक जागने की वज़ह भी तुम ही हो!

#Devprabha_Paridhi

Saturday, 2 December 2017

माँ का दर्द

जब वो कुछ कह नहीं पाती... नजरें चुराती है,
दर्द का समंदर अपने अन्दर छुपाती है,
वो होंठों से मुस्कुराकर सबको दिखाती है,
ना जाने कैसे वो इतना कुछ सह जाती है,
छुपकर सबसे वो अपने आँसू बहाती है,
तिल-तिल कर मिटते अपने वज़ूद को वो,
आँखों पर चश्मा लिए अपने बच्चों में पाती है,
नामुमकिन है उसको इस कदर पूरा बयाँ करना,
इसीलिए वो मेरी माँ कहलाती है....

पति, जिससे थी प्यार और विश्वास की चाहत,
उसी से हमेशा ताने और अपमान पाती है,
बच्चों को ममता की छाँव में पाला,
अब उन्हीं से हर बात पर दुत्कार खाती है,
टूटकर भी हर तरह से वो अपना फ़र्ज निभाती है,
इसीलिए वो मेरी माँ कहलाती है....

माँ मेरी सब पर बस प्यार लुटाती है,
लाख दुःखों को सहकर भी उसके लबों पर उफ़ तक नहीं आती है,
देखकर उसको हर वक़्त मेरा दिल भर आता है,
क्या ईश्वर इस रूप में भी धरती पर आता है,
उम्र मेरी भी सारी मेरी माँ को लग जाये,
जीवन मेरा पूरा माँ के आँचल में समाये,
जिंदगी मेरी ये मुकम्मल हो जाती है,
माँ का मेरी गर एक अंश भी हो पाती है,
माँ ही तो मुझको साकार बनाती है,
इसीलिए वो मेरी माँ कहलाती है....

#Devprabha_Paridhi

Thursday, 21 September 2017

काश! तुम समझ पाते...


काश! तुम ये समझ पाते,
काश! तुम वो समझ जाते...
पर तुम ना समझ पाये,
फ़िर भी ठीक ही है सब कुछ,

जो तुम सब समझ जाते,
तो फ़िर यूं जी भी ना पाते,
और शायद.....
तब मैं भी ना जी पाती तुम्हारे बिन,

ये जो तन्हाई यूं आराम से कटती है अकेले बैठकर,
वो बिन तुम्हारे फ़िर इतनी सरल तो ना होती,

फ़िर....
कुछ यादें, वो बातें, कुछ रस्में और वादे,
सब घेरते मुझे हर दम,
और छीन लेते मुझसे मेरी तन्हाई,
और हर इक़ गम...

पर जो तुम ना समझ पाये,
तो ही ठीक है सब कुछ....
काश! तुम ये समझ पाते,
काश! तुम वो समझ जाते...



#Devprabha_Paridhi

Wednesday, 21 June 2017

ज़िंदगी कट रही है या मुझे काट रही है....


ज़िंदगी कट रही है या मुझे काट रही है....
ना जाने किस गुनाह कि सज़ा बाँट रही है,
होकर तन्हा जब भी बैठू मैं अकेली,
यादों के भँवर से कुछ उम्मीदें झाँक रही है...
ज़िंदगी कट रही है या मुझे काट रही है....

ज़िंदगी जीने और उम्मीदें मरने नहीं देती,
कशमकश ये कैसी मुझे उलझा रही है,
सुलगती हूँ अपनें ही सपनों के ज़ुनून से सीने में,
आग़ कैसी ये मुझे हर पल जला रही है...
ज़िंदगी कट रही है या मुझे काट रही है....

ना जाने मैं कहाँ हूँ, किधर ये ज़िंदगी जा रही है,
कैसे सिमटू, ये तो बिखरती जा रही है,
दिखा दे कोई राह, क्यूं तड़पा रही है,
मिला ले हाथ और लगा ले गले,
ज़िंदगी ही तो है, क्यों सता रही है....

#Devprabha_Paridhi

Wednesday, 14 June 2017

#EGO

Ego या यूँ कहे ‘घमण्ड’| घमण्ड थोड़ा पावरफुल लगता है ना और अपना अर्थ भी ज़्यादा अच्छे से देता है|
      आज ego कि बात इसलिए क्योंकि इंसान ज़्यादातर वही लिखता है या उसी के बारे में लिखता है जो उसका निजी अनुभव होता है| Ego मैंने ज़्यादातर अपने आस-पास के लोगों में ही देखा है और मुझे ये कहने में बिल्कुल भी शर्म नहीं आयेगी कि मैंने अपने परिवार में भी इसे कई बार face किया है|
      अक्सर इंसान खुद में पल रहे ego मे इतना डूब जाता है कि उसे ख़ुद में सब कुछ अच्छा और बाकि सब में कई बुराईयाँ नज़र आती है|
      हर इंसान ख़ुद को बाकि सबसे श्रेष्ठ मानता है| यह कभी सत्य नहीं होता लेकिन मानने में बुराई भी नहीं है| परंतु, इसे हर बात में सामने वाले को नीचा दिखाने का ज़रिया बनाना बुराई है| अगर आप ऐसा करते है तो यहीं से साफ़ हो जाएगा कि आप किसी मूल्य पर श्रेष्ठ नहीं हो सकते| जो सम्मान देने का भाव नहीं रखता, उसे सम्मान पाने की उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिए|
      हर बात में ‘मैं’ ‘मैं’ कह देने से आप कोई भगवान नहीं बन जायेंगें जो सारी दुनिया आपके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो जाये|
      अगर सामने वाला अपनी बातों का बखान नहीं कर रहा है तो यह मत मान लो कि वह हारा हुआ, आपसे तुच्छ या ज़लील किये जाने के लिए ही है| चाहे आप जो भी है लेकिन अगर सौम्य और ‘बिन-मैं’ नहीं जी सकते तो व्यर्थ है आपका कुछ भी होना|
      घमंड तो विद्वान ब्राह्मण ‘रावण’ का भी नहीं टिक पाया, फ़िर हम तो बहुत छोटे से इंसान मात्र हैं| जो व्यक्ति इस श्रेणी में आते हैं वह सभी गौर ज़रूर फरमाईयेगा|
#Devprabha_Paridhi