Wednesday, 14 June 2017

#EGO

Ego या यूँ कहे ‘घमण्ड’| घमण्ड थोड़ा पावरफुल लगता है ना और अपना अर्थ भी ज़्यादा अच्छे से देता है|
      आज ego कि बात इसलिए क्योंकि इंसान ज़्यादातर वही लिखता है या उसी के बारे में लिखता है जो उसका निजी अनुभव होता है| Ego मैंने ज़्यादातर अपने आस-पास के लोगों में ही देखा है और मुझे ये कहने में बिल्कुल भी शर्म नहीं आयेगी कि मैंने अपने परिवार में भी इसे कई बार face किया है|
      अक्सर इंसान खुद में पल रहे ego मे इतना डूब जाता है कि उसे ख़ुद में सब कुछ अच्छा और बाकि सब में कई बुराईयाँ नज़र आती है|
      हर इंसान ख़ुद को बाकि सबसे श्रेष्ठ मानता है| यह कभी सत्य नहीं होता लेकिन मानने में बुराई भी नहीं है| परंतु, इसे हर बात में सामने वाले को नीचा दिखाने का ज़रिया बनाना बुराई है| अगर आप ऐसा करते है तो यहीं से साफ़ हो जाएगा कि आप किसी मूल्य पर श्रेष्ठ नहीं हो सकते| जो सम्मान देने का भाव नहीं रखता, उसे सम्मान पाने की उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिए|
      हर बात में ‘मैं’ ‘मैं’ कह देने से आप कोई भगवान नहीं बन जायेंगें जो सारी दुनिया आपके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो जाये|
      अगर सामने वाला अपनी बातों का बखान नहीं कर रहा है तो यह मत मान लो कि वह हारा हुआ, आपसे तुच्छ या ज़लील किये जाने के लिए ही है| चाहे आप जो भी है लेकिन अगर सौम्य और ‘बिन-मैं’ नहीं जी सकते तो व्यर्थ है आपका कुछ भी होना|
      घमंड तो विद्वान ब्राह्मण ‘रावण’ का भी नहीं टिक पाया, फ़िर हम तो बहुत छोटे से इंसान मात्र हैं| जो व्यक्ति इस श्रेणी में आते हैं वह सभी गौर ज़रूर फरमाईयेगा|
#Devprabha_Paridhi

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