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Thursday, 21 September 2017

काश! तुम समझ पाते...


काश! तुम ये समझ पाते,
काश! तुम वो समझ जाते...
पर तुम ना समझ पाये,
फ़िर भी ठीक ही है सब कुछ,

जो तुम सब समझ जाते,
तो फ़िर यूं जी भी ना पाते,
और शायद.....
तब मैं भी ना जी पाती तुम्हारे बिन,

ये जो तन्हाई यूं आराम से कटती है अकेले बैठकर,
वो बिन तुम्हारे फ़िर इतनी सरल तो ना होती,

फ़िर....
कुछ यादें, वो बातें, कुछ रस्में और वादे,
सब घेरते मुझे हर दम,
और छीन लेते मुझसे मेरी तन्हाई,
और हर इक़ गम...

पर जो तुम ना समझ पाये,
तो ही ठीक है सब कुछ....
काश! तुम ये समझ पाते,
काश! तुम वो समझ जाते...



#Devprabha_Paridhi

Wednesday, 21 June 2017

ज़िंदगी कट रही है या मुझे काट रही है....


ज़िंदगी कट रही है या मुझे काट रही है....
ना जाने किस गुनाह कि सज़ा बाँट रही है,
होकर तन्हा जब भी बैठू मैं अकेली,
यादों के भँवर से कुछ उम्मीदें झाँक रही है...
ज़िंदगी कट रही है या मुझे काट रही है....

ज़िंदगी जीने और उम्मीदें मरने नहीं देती,
कशमकश ये कैसी मुझे उलझा रही है,
सुलगती हूँ अपनें ही सपनों के ज़ुनून से सीने में,
आग़ कैसी ये मुझे हर पल जला रही है...
ज़िंदगी कट रही है या मुझे काट रही है....

ना जाने मैं कहाँ हूँ, किधर ये ज़िंदगी जा रही है,
कैसे सिमटू, ये तो बिखरती जा रही है,
दिखा दे कोई राह, क्यूं तड़पा रही है,
मिला ले हाथ और लगा ले गले,
ज़िंदगी ही तो है, क्यों सता रही है....

#Devprabha_Paridhi