ज़िंदगी कट रही है या
मुझे काट रही है....
ना जाने किस गुनाह कि सज़ा
बाँट रही है,
होकर तन्हा जब भी बैठू
मैं अकेली,
यादों के भँवर से कुछ उम्मीदें
झाँक रही है...
ज़िंदगी कट रही है या मुझे
काट रही है....
ज़िंदगी जीने और उम्मीदें
मरने नहीं देती,
कशमकश ये कैसी मुझे उलझा
रही है,
सुलगती हूँ अपनें ही सपनों
के ज़ुनून से सीने में,
आग़ कैसी ये मुझे हर पल
जला रही है...
ज़िंदगी कट रही है या मुझे
काट रही है....
ना जाने मैं कहाँ हूँ,
किधर ये ज़िंदगी जा रही है,
कैसे सिमटू, ये तो बिखरती
जा रही है,
दिखा दे कोई राह, क्यूं
तड़पा रही है,
मिला ले हाथ और लगा ले
गले,
ज़िंदगी ही तो है, क्यों
सता रही है....
#Devprabha_Paridhi

No comments:
Post a Comment