Showing posts with label Broken. Show all posts
Showing posts with label Broken. Show all posts

Saturday, 2 February 2019

बेगैरत



हमारे कुछ राज़...
अपने सीने में दफ़न कर लो,
की शायद फ़िर नींद ना आये तुम्हें,
ये जो दर्द देकर...
बेगैरत से फिरते हो तुम,
कि हमारे देर तक जागने की वज़ह भी तुम ही हो!

#Devprabha_Paridhi

Monday, 21 January 2019

खंज़र


वो हाथों में लिये खोजते है,
हम खंज़र से अपने ही का गला है|

Friday, 16 February 2018

सपनोँ की खुदखुशी



इंसान हूँ, फ़रिश्ता नहीं
क्यों समझते हो की दर्द होता नहीं?

दर्द होता है, ऐसा दर्द जैसे तिल-तिल कर मरता हो कोई,
जैसे जिस्म ज़िन्दा हो और साँस छीन रहा हो कोई...

क्या महसूस किया है कभी,
जीने की तड़प और मरने की चाहत के बीच की वो जलन,
जिसमे हर पल जलता हो कोई...

या कर पाओगे महसूस अभी,
कैसे जीता है वो, जिसकी चंद साँसों से खेल जाता हो कोई,
खेल सकते है वो जिसके पास बाकी हो पूरी ज़िंदगी...

लेकिन, मैं तो इंसान हूँ, कोई फ़रिश्ता नहीं...

चलो, जीओ एक दिन, जिसमें ख़त्म हो तुम्हारी हर उम्मीद,
बंद हो जाये हर रास्तें और,
सपनोँ के पीछे भागते-भागते थक जाये तुम्हारा शरीर,
अँधेरा, हताशा, निराशा की जकड़े हो जंजीर,
और घुटन की आह से ताज़ा रहे हर पीर,

उस वक़्त, ठीक उसी वक़्त मैं कहूँगी...
“ख़ुश रहो यार, हो जायेगा ना सब ठीक!”
तब तुम कहना, “क्या मान पाओगे मेरी ये सीख?”
नहीं होता इतना आसान, क्योंकि मैं तो हूँ सिर्फ़ एक इंसान,
कोई फ़रिश्ता नहीं...

गरीब की ग़रीबी का दर्द और,
इंसान के सपनोँ की खुदखुशी के जख्मों को,
क्या महसूस किया है कभी?
या कर पाओगे अभी?
या जी पाओगे फ़िर उसके बाद तुम सभी?
नहीं, नहीं, नहीं............!!!
मौत शायद बेहतर होती होगी,
यूं आसान नहीं होती सपनों की खुदखुशी कभी!

Monday, 4 September 2017

एक_बार_आना_ज़रूर!

बेवज़ह तन्हा सी ज़िन्दगी में तुम्हारा यूं वजह बनकर चुपचाप चले आना, आज भी अच्छी तरह याद है मुझे| कब तुमने मुझपे सारे हक़ ले लिए और कब तुम मेरा सब कुछ बनते चले गये, पता ही नहीं चला| हर बात में तुम आते गये, हर साँस में घुलते चले गये|
ज़रूरत तो नहीं थी लेकिन ख्वाहिश थी किसी के होने की..... हमेशा से ! और वो तुमने आकर पूरी कर दी| वक़्त बीतता गया और तुम, मुझमें साथ-साथ और साँस-साँस एक होते चले गये|
      उस वक़्त एहसास ही नहीं हुआ कभी की हम दो है| सब कुछ एक ही लगता था|
तुम.....मैं........मैं.....तुम | बस इतना ही |
जिस्मों से नहीं, रूह से रिश्ता था हमारा....क्योंकि जिस्मों से तो ज़रूरते पूरी होती है ना| तुम भी तो यही कहते थे |
फ़िर.......!!!
क्या हुआ था उस दिन? मेरा तो वो दिन भी अब तक ख़त्म ही नहीं हुआ | तुम ही बता दो ना|
चले गये बस तुम...क्यों? कहाँ? किसलिए? कुछ भी नहीं बताया | किसकी कमी थी जिसके लिए तुम्हारी तलाश मुझ पर ख़त्म नहीं हुई | क्या था जो तुम्हेँ हमारे इस रिश्ते से ज़्यादा गहरा लगा और तुम चले गये|
“रूह की गिरफ़्त भी कमज़ोर हो चली,
दिलों को पिरोने की वो सुई कहाँ गयी...?”
जिस दिन तुम्हेँ पता चल जाए और तुम्हारी तलाश ख़त्म हो जाये तो एक बार मुझे बताना ज़रूर |
मेरी ग़लतफ़हमियां ख़त्म करने के लिए ही सही एक बार आना ज़रूर|

#Devprabha_Paridhi

Thursday, 6 April 2017

Love in The Broken Heart

   
   लगती हो तुम ऐसे जैसे,
कोई चाँद फ़लक पे हो वैसे,
आसमां भी चुपके से तुझको झुकके देखा करे,
क्या तारे भी चमका करते
देख तुझे शरमाते हुए,
तेरे नूर से ही रोशन हुए,
मेरी ज़िंदगी के हर नगमे,
........
तेरे चेहरे की वो लालिमा,
हर शाम ढले सूरज में दिखे,
देखूं मैं जब भी आईना,
मुझमें तेरा क्यों रूप दिखे,
रातों को चाँद मुझे पूछे-
“क्यों आँखे नम कर लेती हो...
दिल में जो ख़्वाब पिरोये है...
क्यों उन्हें टूटने देती हो...
इस प्रेम मिलन की बेला में...
मुझको भी चाँदनी मिलती है...
तेरा तो प्यार अनूठा है...
फ़िर क्यों वो तुझसे रूठा है...”
कुछ सोचके, उसको समझाऊँ,
“ऐ चाँद तुझे क्या बतलाऊँ...
किस्मत ने खेल जो खेला है..
उस प्यार को जितना प्यार किया...
उतना ही दर्द भी झेला है...
रूठा तो नहीं है वो मुझसे...
रूठी अब मैं ही हूँ खुदसे...
क्यों प्यार किया मैंने इतना...
जब दूर उसे जाना ही था...
तेरी रातों के सपनों जैसे...
मेरे ख्वाबों को भी टूट जाना था...
हर रात तुझे एक आस रहे...
कि चाँदनी तुझसे मिलती है...
मेरा तो अब कोई ख़्वाब नहीं...
बस मेरे सपने और तन्हाई है...
..............
हँसती तो होगी हर महफ़िल मुझपे,
क्या देखो इसका हाल हुआ,
बड़ी प्यार की माला जपती थी,
प्यार में ही सब बर्बाद हुआ,
इतने पे भी यूं सितम देखो,
वो प्यार हमारा पूछे हमसे,
‘कैसे है हाल दीवानों के,
कोई खबर नहीं आई कबसे’
..............
वो क्या समझेंगे हाल मेरा,
अब उम्मीद नहीं ये हमें उनसे,
एक दिन याद तो आयेगी,
जब बिछड़ेंगे हम भी उनसे,
..............
उनका कुछ दोष नहीं यारों,
गलती शायद मैंने ही की,
रोका होता ख़ुद को पहले,
तो शायद मैं भी खुश होती,
अब सोच लिया है मैंने भी,
इन सबसे दूर चले जाना,
ख़ुद को ही है ख़ुद में पाना,


बस ख़ुद को ही है खो देना...!!!
#Devprabha_Paridhi

Monday, 7 November 2016

सपने


हमनें भी थे देखे सपने,
कुछ छोटे कुछ बड़े कई,
चाहत थी बस साथ हो अपने,
चाहत ना पूरी हुई वही,
ज़ुनून फ़िर भी कम ना हुआ,
बस टूटे जब भी तो वजह थी वही,
हमनें भी थे देखे सपने कई...!!! L