वक़्त, बेवक़्त, मेरे पास है वो
हर घड़ी, हर लम्हें में आफ़ताब है वो,
कभी क़िस्सा, कभी कहानी, तो कभी क़िताब है वो,
मेरी चाहत, बहुत लाज़वाब है वो,
कभी आँखों में, कभी चेहरे पे
बिखरा नायाब है वो,
उसे भूलूँ तो भी कैसे
मेरे हर तरफ़ गुलज़ार है वो।
#Devprabha_Paridhi
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Monday, 8 April 2019
वो
Monday, 21 January 2019
Friday, 16 February 2018
सपनोँ की खुदखुशी
इंसान हूँ, फ़रिश्ता नहीं
क्यों समझते हो की दर्द
होता नहीं?
दर्द होता है, ऐसा दर्द
जैसे तिल-तिल कर मरता हो कोई,
जैसे जिस्म ज़िन्दा हो और साँस
छीन रहा हो कोई...
क्या महसूस किया है कभी,
जीने की तड़प और मरने की
चाहत के बीच की वो जलन,
जिसमे हर पल जलता हो
कोई...
या कर पाओगे महसूस अभी,
कैसे जीता है वो, जिसकी
चंद साँसों से खेल जाता हो कोई,
खेल सकते है वो जिसके पास
बाकी हो पूरी ज़िंदगी...
लेकिन, मैं तो इंसान हूँ,
कोई फ़रिश्ता नहीं...
चलो, जीओ एक दिन, जिसमें
ख़त्म हो तुम्हारी हर उम्मीद,
बंद हो जाये हर रास्तें
और,
सपनोँ के पीछे भागते-भागते थक जाये तुम्हारा शरीर,
अँधेरा, हताशा, निराशा की
जकड़े हो जंजीर,
और घुटन की आह से ताज़ा
रहे हर पीर,
उस वक़्त, ठीक उसी वक़्त
मैं कहूँगी...
“ख़ुश रहो यार, हो जायेगा
ना सब ठीक!”
तब तुम कहना, “क्या मान
पाओगे मेरी ये सीख?”
नहीं होता इतना आसान,
क्योंकि मैं तो हूँ सिर्फ़ एक इंसान,
कोई फ़रिश्ता नहीं...
गरीब की ग़रीबी का दर्द
और,
इंसान के सपनोँ की
खुदखुशी के जख्मों को,
क्या महसूस किया है कभी?
या कर पाओगे अभी?
या जी पाओगे फ़िर उसके बाद
तुम सभी?
नहीं, नहीं,
नहीं............!!!
मौत शायद बेहतर होती
होगी,
यूं आसान नहीं होती सपनों की खुदखुशी कभी!
Location:India
Udaipur, Rajasthan, India
Monday, 4 September 2017
आख़िर कैसा हो वो?
प्यार पर यकीं है
मुझे, कान्हा में आस्था है मेरी...
पर कैसे करूँ
किसी के प्यार का विश्वास,
जब सबके प्यार को
है बस मतलब की आस |
मेरे ये विचार
जिन्हें पसंद नहीं आते,
वो अक्सर मुझसे
यही है पूछते-
“आख़िर कैसा हो वो
जो पसंद तुम्हेँ आये?”
मेरा सीधा सा
जवाब-
वो जो सौम्य हो,
शीतल हो...
प्रेम जिसका
अविरल हो,
नैन जिसके मुझसे
सारी बातें बयाँ कर दे,
शब्दों को कभी
कुछ कहना ना पड़े...
स्वभाव जिसका
शांतिमय हो,
वाणी जिसकी मधुमय हो,
प्रेम पे जिसके मैं वारी जाऊं
नज़रों से सबकी बचकर उसी की हो जाऊ,
क्रोध, घमंड उसकी दुनिया में ना हो,
सबके दिलों पर राज़ करने वाला स्वभाव हो
संग उसका मुझे अनुपम एहसास कराये,
ख़ुशियाँ हमारे आस पास मंडराए,
एक-दूजे की दुनिया का ख़ालीपन हम भर दे,
बस! इतनी सी ख्वाहिश वो
मेरी पूरी कर दे |
Wednesday, 21 June 2017
ज़िंदगी कट रही है या मुझे काट रही है....
ज़िंदगी कट रही है या
मुझे काट रही है....
ना जाने किस गुनाह कि सज़ा
बाँट रही है,
होकर तन्हा जब भी बैठू
मैं अकेली,
यादों के भँवर से कुछ उम्मीदें
झाँक रही है...
ज़िंदगी कट रही है या मुझे
काट रही है....
ज़िंदगी जीने और उम्मीदें
मरने नहीं देती,
कशमकश ये कैसी मुझे उलझा
रही है,
सुलगती हूँ अपनें ही सपनों
के ज़ुनून से सीने में,
आग़ कैसी ये मुझे हर पल
जला रही है...
ज़िंदगी कट रही है या मुझे
काट रही है....
ना जाने मैं कहाँ हूँ,
किधर ये ज़िंदगी जा रही है,
कैसे सिमटू, ये तो बिखरती
जा रही है,
दिखा दे कोई राह, क्यूं
तड़पा रही है,
मिला ले हाथ और लगा ले
गले,
ज़िंदगी ही तो है, क्यों
सता रही है....
#Devprabha_Paridhi
Location:India
Udaipur, Rajasthan, India
Thursday, 11 May 2017
कभी तो सपनों मे आ.....
कभी तो सपनों मे आ,
मुझे भी तेरी दुनिया मे ले जा,
तेरे हाथों कि ऊँगलियों से यूँ बंध जाये मेरे हाथ,
तेरी बाँहों मे सिमटू, बस चलूं तेरे साथ-साथ,
ना तू कुछ बोले, ना मैं कुछ कहूँ...
आँखों ही आँखों मे सारा हाल पढ़ लूँ,
कभी हम चलेंगे उस नदी के किनारे भी,
जिसको आस है सागर से मिलने की आज भी,
तुझसे जुदाई के दर्द को उससे बाटूंगी,
तो कुछ सुनूँगी उसका दर्द भी,
“सुना है! दर्द बाँटने से कम होता है”
शायद कुछ कम हो जाये मेरा दर्द भी...
जो मिले तेरा साथ सपनों में ही सही,
तो ना खोलूं कभी अपनी आँखें,
बंद कर लूं तुझे पलकों मे ही
कहीं,
कभी तो सपनों मे आ,
मुझे भी तेरी दुनिया मे ले जा...
ना तू मिले, ना मेरा हो, कोई शिकवा नहीं,
बस तेरे होने के सिवा, चाहा मैंने कुछ और नहीं,
ये साँसे और ज़िंदगी सौंप दी है उसे,
जिसे पाने कि चाहत पूरी हो जाये सपनों मे ही कहीं...
कभी तो सपनों मे आ,
मुझे भी तेरी दुनिया मे ले जा...
#Devprabha_Paridhi
Monday, 7 November 2016
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