Wednesday, 21 June 2017

ज़िंदगी कट रही है या मुझे काट रही है....


ज़िंदगी कट रही है या मुझे काट रही है....
ना जाने किस गुनाह कि सज़ा बाँट रही है,
होकर तन्हा जब भी बैठू मैं अकेली,
यादों के भँवर से कुछ उम्मीदें झाँक रही है...
ज़िंदगी कट रही है या मुझे काट रही है....

ज़िंदगी जीने और उम्मीदें मरने नहीं देती,
कशमकश ये कैसी मुझे उलझा रही है,
सुलगती हूँ अपनें ही सपनों के ज़ुनून से सीने में,
आग़ कैसी ये मुझे हर पल जला रही है...
ज़िंदगी कट रही है या मुझे काट रही है....

ना जाने मैं कहाँ हूँ, किधर ये ज़िंदगी जा रही है,
कैसे सिमटू, ये तो बिखरती जा रही है,
दिखा दे कोई राह, क्यूं तड़पा रही है,
मिला ले हाथ और लगा ले गले,
ज़िंदगी ही तो है, क्यों सता रही है....

#Devprabha_Paridhi

Wednesday, 14 June 2017

#EGO

Ego या यूँ कहे ‘घमण्ड’| घमण्ड थोड़ा पावरफुल लगता है ना और अपना अर्थ भी ज़्यादा अच्छे से देता है|
      आज ego कि बात इसलिए क्योंकि इंसान ज़्यादातर वही लिखता है या उसी के बारे में लिखता है जो उसका निजी अनुभव होता है| Ego मैंने ज़्यादातर अपने आस-पास के लोगों में ही देखा है और मुझे ये कहने में बिल्कुल भी शर्म नहीं आयेगी कि मैंने अपने परिवार में भी इसे कई बार face किया है|
      अक्सर इंसान खुद में पल रहे ego मे इतना डूब जाता है कि उसे ख़ुद में सब कुछ अच्छा और बाकि सब में कई बुराईयाँ नज़र आती है|
      हर इंसान ख़ुद को बाकि सबसे श्रेष्ठ मानता है| यह कभी सत्य नहीं होता लेकिन मानने में बुराई भी नहीं है| परंतु, इसे हर बात में सामने वाले को नीचा दिखाने का ज़रिया बनाना बुराई है| अगर आप ऐसा करते है तो यहीं से साफ़ हो जाएगा कि आप किसी मूल्य पर श्रेष्ठ नहीं हो सकते| जो सम्मान देने का भाव नहीं रखता, उसे सम्मान पाने की उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिए|
      हर बात में ‘मैं’ ‘मैं’ कह देने से आप कोई भगवान नहीं बन जायेंगें जो सारी दुनिया आपके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो जाये|
      अगर सामने वाला अपनी बातों का बखान नहीं कर रहा है तो यह मत मान लो कि वह हारा हुआ, आपसे तुच्छ या ज़लील किये जाने के लिए ही है| चाहे आप जो भी है लेकिन अगर सौम्य और ‘बिन-मैं’ नहीं जी सकते तो व्यर्थ है आपका कुछ भी होना|
      घमंड तो विद्वान ब्राह्मण ‘रावण’ का भी नहीं टिक पाया, फ़िर हम तो बहुत छोटे से इंसान मात्र हैं| जो व्यक्ति इस श्रेणी में आते हैं वह सभी गौर ज़रूर फरमाईयेगा|
#Devprabha_Paridhi

Wednesday, 7 June 2017

घर जाना चाहता हूँ !!!


थक गया हूँ बहुत घर आना चाहता हूँ,
माँ कि गोद में जाकर बस सो जाना चाहता हूँ...
थोड़ा प्यार और थोड़ी वो बहना कि तकरार याद आती है,
आँख खुलते ही सपनों के टूटने पर, आँखें भर जाती है!!!
सबके प्यार को तरसती पल-पल मेरी निगाहें,
छुपकर एक कोने में रोते जाना चाहता हूँ...
थक गया हूँ बहुत घर आना चाहता हूँ |||

“कैसे हो गया मैं गुनहगार सभी का?”
बस इसी का जवाब ढूंढ़ते-ढूंढ़ते डूबकर मर जाना चाहता हूँ|
है कुछ लोग जो मरने ही नहीं देते मुझे,
उन्हें बस यही समझाना चाहता हूँ...
जब खुश नहीं है मेरे अपने,
तो फ़िर कैसे कहूँ “मैं जीना चाहता हूँ”....
ना आज कुछ और ना कल चाहता हूँ,
बस! एक बार पापा से गले लग जाना चाहता हूँ,
थक गया हूँ बहुत घर आना चाहता हूँ |||

“क्यों कर दिया पराया अपनों ने ही मुझे?”
यही सवाल मैं बार-बार दोहराना चाहता हूँ...
गलती नहीं थी मेरी, है सब वक़्त का फेर,
दे दो बस थोड़ी मोहलत, यही कहना चाहता हूँ...
चाहे हो कितनी तकलीफ़ें और मुश्किल, हँसकर लड़ जाउँगा मैं,
ग़र साथ नहीं हैं अपने, फ़िर कैसे जी पाउँगा मैं,
बस थोड़ा प्यार और विश्वास पाना चाहता हूँ,
थक गया हूँ बहुत घर आना चाहता हूँ |||

काश! वो कहें – “घर आ जा बेटा, जो होगा देख लेंगे”
ज़िंदगी इसी से जीत जाना चाहता हूँ,
थक गया हूँ बहुत घर आना चाहता हूँ.....
माँ कि गोद में जाकर बस सो जाना चाहता हूँ !!!
#Devprabha_Paridhi