प्राकृतिक आपदाएं चेहरा, धर्म, स्थिति-परिस्थितियों को नहीं देखती...बस कहर बनकर बरसती हैं और छीन ले जाती है चैन, सुकून, खुशियां, सिर से छत और कई जिंदगियां...। कहते हैं जब मानवता अपना अस्तित्व छोड़ती है, तो प्रकृति कहर बन जाती है... लेकिन केरल के हालात ...
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