Tuesday, 21 June 2016

वो पल भी अजीब था, या शायद मैं खुशनसीब था...!!!

वो पल भी अजीब था,
या शायद मैं खुशनसीब था,
हर दिन की तरह गुज़र रहा था,
लम्हों में गुज़रता एक लम्हा जुड़ रहा था,
ख्यालों में तस्वीर सजायी थी तुम्हारी,
बारिश की फुहारों में तुम्हें गढ़ रहा था,

सामने से गुज़र कर अचानक वो चेहरा दिखा,
जिसे कुछ देर पहले मैं बूंदों में पढ़ रहा था,
दिल घबरा सा गया,मैं तो सकपका सा गया,
लगा यूं अचानक ख्यालों की भी चोरी हो गयी,
करते हैं इश्क़ हज़ारों आशिक़ सावन की बारिश में,
फ़िर मेरी ही क्यों आशिक़ी यूं झलक भर पेश की गयी,

सावन की झड़ी बढ़ रही थी,
मेरी आशिक़ी भी उमड़ रही थी,
ढूंढता फिरा उस ‘परी’ सा मुखड़ा जहाँ में,
ना आया नज़र, कहीं उड़ गया हवा में, :(
अबके सावन तू ये हसरत पूरी करना,
मेरे महबूब की बांहों में इश्क का बरसे झरना,
भीग जाऊं लिपट कर उसी से,
या हो जाऊ एक सिमट कर उसी में,

एक बार ए ख़ुदा वो पल लौटा दे मुझे,
उस पल को रोककर सदियां जी लूं उसमें,
जो पल अजीब था, जिसमें मैं ख़ुशनसीब था...!!!

-DJ Paridhi

3 comments:

  1. एक खूबसूरत परिकल्पना..परिधि की...

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