उर्दू के मशहूर आलोचक जानकी प्रसाद शर्मा तो यह मानते ही हैं कि ‘मीर जैसी भावों की व्यापकता और गहराई तथा भाषा का सहज औदात्य अगर किसी में है तो वे फ़िराक़ ही हैं।
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