Friday, 16 February 2018

सपनोँ की खुदखुशी



इंसान हूँ, फ़रिश्ता नहीं
क्यों समझते हो की दर्द होता नहीं?

दर्द होता है, ऐसा दर्द जैसे तिल-तिल कर मरता हो कोई,
जैसे जिस्म ज़िन्दा हो और साँस छीन रहा हो कोई...

क्या महसूस किया है कभी,
जीने की तड़प और मरने की चाहत के बीच की वो जलन,
जिसमे हर पल जलता हो कोई...

या कर पाओगे महसूस अभी,
कैसे जीता है वो, जिसकी चंद साँसों से खेल जाता हो कोई,
खेल सकते है वो जिसके पास बाकी हो पूरी ज़िंदगी...

लेकिन, मैं तो इंसान हूँ, कोई फ़रिश्ता नहीं...

चलो, जीओ एक दिन, जिसमें ख़त्म हो तुम्हारी हर उम्मीद,
बंद हो जाये हर रास्तें और,
सपनोँ के पीछे भागते-भागते थक जाये तुम्हारा शरीर,
अँधेरा, हताशा, निराशा की जकड़े हो जंजीर,
और घुटन की आह से ताज़ा रहे हर पीर,

उस वक़्त, ठीक उसी वक़्त मैं कहूँगी...
“ख़ुश रहो यार, हो जायेगा ना सब ठीक!”
तब तुम कहना, “क्या मान पाओगे मेरी ये सीख?”
नहीं होता इतना आसान, क्योंकि मैं तो हूँ सिर्फ़ एक इंसान,
कोई फ़रिश्ता नहीं...

गरीब की ग़रीबी का दर्द और,
इंसान के सपनोँ की खुदखुशी के जख्मों को,
क्या महसूस किया है कभी?
या कर पाओगे अभी?
या जी पाओगे फ़िर उसके बाद तुम सभी?
नहीं, नहीं, नहीं............!!!
मौत शायद बेहतर होती होगी,
यूं आसान नहीं होती सपनों की खुदखुशी कभी!