Monday, 17 December 2018

मेरा खज़ाना

आज मैं पुराना खज़ाना खोलकर बैठी थी....क्या हुआ? अरे, खज़ाना वो आपका पैसों वाला नहीं, बल्कि मेरा किताबों और डायरियों वाला| दरअसल, मैं एक नयी डायरी निकालने के लिए सब सामानों में उथल-पुथल मचा रही थी| मुझे बहुत पसंद है डायरी, पेन, किताबें....शुरू से ही और इसी शुरू की शुरुआत से आपको रूबरू करवाने के लिए ये लेख लिखा जा रहा है| खज़ाने को खंगालते खंगालते मुझे करीब 2 घंटे से ऊपर का समय बीत गया लेकिन नयी डायरी वाला बॉक्स हाथ में नहीं आया| लेकिन मैं भी हार कहाँ मानने वाली थी| फ़िर, कुछ देर बाद मेरे हाथ में डायरी के collection वाला बॉक्स लग ही गया और उसी में सबसे ऊपर ये पैकेट राखा हुआ था जिसमे मेरी ये शुरू से अब तक की लिखी हुई डायरियाँ थी|

मेरा खज़ाना

 ये कुछ अंश हैं जो व्यवस्थित रखे हुए हैं बाकि काफ़ी कुछ है जो समय पर हाथ नहीं आती| होता होगा ना आपके साथ भी ऐसा?
लिखने से मेरा नाता कितना पुराना है ये आप सब अंदाज़ा लगा सकते है| जब कोई दोस्त नहीं होते थे तबसे मेरी डायरी मेरी दोस्त हुआ करती है| ये मेरी फर्स्ट फ्रेंड (FF) हैं| लिखना पहले भी ख़ुशी देता था और आज तो और भी ज़्यादा ख़ुश कर देता है क्योंकि पहले सिर्फ मैं ही जानती थी की मैं लिखती हूँ और मैं ही ख़ुश भी हो जाती थी, लेकिन अब कई लोग जानते है और पसंद भी करते हैं| बस यही सराहना और ज़्यादा ख़ुश कर देती है| बाक़ी, लिखते तो पहले भी थे और आगे भी लिखेंगे| ख़ुद के लिए तो हमेशा और लोग पसंद करेंगे तब तक उनके लिए भी|
बस, प्रेम और आशीर्वाद मिलता रहे|

#Devprabha_Paridhi

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