‘आदत’ बहुत जल्दी हो जाती है किसी इंसान को| चाहे वह किसी बात की
हो, किसी काम की या.... किसी इंसान की|
कभी कुछ काम किया तो उसकी
‘आदत’ हो गई तो कभी
कुछ दिन नहीं किया तो उसमें ढल गये|
कभी किसी से बात करने लगे
तो कुछ दिन में उसकी ‘आदत’ हो जाती है, तो बात ना होने पर बिना बात किये रहने की भी ‘आदत’ हो जाती है|
कभी किसी नयी
जगह रहने लगे तो कुछ दिन अटपटा महसूस करने के बाद ‘आदत’ हो जाती है, फ़िर कभी वो जगह छोड़ देने के बाद वहाँ ना रहने
की भी ‘आदत’ हो जाती है|
कभी तन्हा रहने
वाले को कोई भीड़ में पसंद आ जाये तो भीड़ भी अच्छी लगने लगती है, तो कभी वही उस भीड़
में भी तन्हा हो जाता है|
इंसान भी कितना
अजीब है ना! आदतों का मारा हुआ|
मुझे भी तो
नहीं थी ना किसी के साथ की ‘आदत’| किसी से गुफ़्तगू की ‘आदत’| लेकिन हो ही गयी ना जब ‘तुम’ आये| दूर तो तुमसे भी जाने
की कोशिश बहुत की थी मैंने| लेकिन फ़िर तुम्हारे साथ की ‘आदत’ हो गयी| तुमसे
बातें करना हर रोज़| तुमसे बात किये बिना लगता जैसे घुटन होने लगी हो| बिना मिले एक
दिन भी सदियों सा लगने लगता| बस तुम्हेँ देख लेती तो लगता, सब कुछ मिल गया हो
जैसे|
‘आदत’ हो गयी थी मुझे, तुम्हारी| और अब देखो!
फ़िर से तन्हा रहने की भी ‘आदत’ हो गयी है..... पहले
की तरह| अब ख़ुद से ही कर लेती हूँ ढेरों बातें..... फ़िर से| अब अकेली ही रहती हूँ|
भीड़ में भी और तन्हाई में भी..... हमेशा की तरह|
तुम्हेँ भी तो हो गयी
होगी ना ‘आदत’..... मेरे बिना
रहने की? तुम तो पहले से ही आदी थे मेरे बिना रहने के, तभी तो चले गये चुपचाप|
खैर, ‘आदत’ हो ही जाती है|
#Devprabha_Paridhi
Kya bat hai joshi ji����
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